जिले में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक मिलाकर ढाई हजार विद्यालय संचालित हो रहे है। जिसमें से दो सौ अधिक विद्यालय अध्यापक विहीन है। बंद विद्यालयों को पूर्ण रूप से संचालित करने के साथ शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए तीन हजार से अधिक शिक्षकों की आवश्यकता है। कुछ अध्यापक तो ऐसे है जिनके पास एक से
अधिक विद्यालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यही नही तीस जून को 147 अध्यापक सेवानिवृत्त हो रहे है। शासन ने बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए एमडीएम, निश्शुल्क ड्रेस, छात्रवृत्ति के साथ तमाम सुविधाएं मुहैया कराई है। जिसका असर है विद्यालय पर छात्रों के नामांकन में तो वृद्धि हुई लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की गति को बढ़ाया नही जा सका। जिसका खुलासा ब्लाक से लेकर जिलास्तरीय अधिकारियों के निरीक्षण में विद्यालयों पर पूरे सत्र होता रहता है। कुछ नए विद्यालयों का भवन निर्माण भी विभागीय प्रक्रिया पूरी न हो पाने के कारण शुरू नही हो पा रहा है। स्कूलों में बालिका शिक्षा योजना, मीना मंच, विकलांग शिक्षा सहित कई अन्य योजनाओं को कागज में ही दीमक चाट रहे है।
इसमें कोई दो राय नही है कि शिक्षकों की कमी व संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित नही हो पा रही है। लेकिन जो मैन पावर व संसाधन है उसी के साथ शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के साथ योजनाओं के प्रभावी संचालन का प्रयास किया जा रहा है। बीते सत्र में कुछ बिंदुओं पर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय हुई तो उसका परिणाम सकारात्मक देखने को मिला। व्यवस्था पूरी तरीके से चौक चौबंद हो और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो इसके लिए सभी को एकजुट होकर काम करना होगा। लंबित कार्यो कों नए सत्र में पूरा कराने के साथ उपलब्ध संसाधनों से छात्र छात्राओं को बेहतर शिक्षा देने के साथ योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।

